- मनीष कुमार
हजारीबाग: नगर निगम क्षेत्र अंतर्गत वार्ड संख्या-23 स्थित कस्तूरी खाप के लबकी पोखर (तालाब) में चल रहे विकास कार्य की पारदर्शिता को लेकर अब गंभीर सवाल उठने लगे हैं। यहां लगभग एक करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से तालाब के गहरीकरण एवं सौंदर्यीकरण का कार्य कराया जा रहा है, लेकिन संवेदक (ठेकेदार) की कार्यप्रणाली से स्थानीय ग्रामीणों में तीव्र आक्रोश है। कार्य शुरू हुए 20 दिनों से अधिक का समय बीत चुका है, इसके बावजूद आज तक योजना स्थल पर नियमों के मुताबिक कोई एस्टीमेट बोर्ड नहीं लगाया गया है। किसी भी सरकारी योजना में कार्य शुरू होने से पहले बोर्ड लगाना अनिवार्य माना जाता है ताकि आम जनता को योजना की कुल लागत, कार्य की कुल अवधि, संवेदक का नाम और संबंधित विभाग की स्पष्ट जानकारी मिल सके। लेकिन यहां जानकारी छुपाने की कोशिश से लोगों में भ्रष्टाचार और अनियंत्रित कार्य को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
चार फीट की जगह सिर्फ किनारे से मिट्टी काटने का खेल
योजना में बरती जा रही तकनीकी लापरवाही को लेकर स्थानीय ग्रामीणों का गुस्सा फूट पड़ा है। ग्रामीण राहुल सिंह और रोहित सिंह ने कार्यस्थल पर सीधे तौर पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि इस गहरीकरण योजना के तहत तालाब से पूरे चार फीट मिट्टी काटने का सरकारी प्रावधान तय किया गया है। लेकिन संवेदक द्वारा नियमों को ताक पर रखकर केवल तालाब के किनारों से ही मिट्टी काटी जा रही है, ताकि यह दिखाया जा सके कि चार फीट की खुदाई पूरी कर ली गई है। ग्रामीणों का आरोप है कि ठेकेदार जानबूझकर इस महत्वपूर्ण कार्य में अत्यधिक देरी कर रहा है, ताकि जल्द ही बारिश का मौसम शुरू हो जाए और पानी भरने के बहाने मिट्टी कटाई का काम बीच में ही बंद कर दिया जाए। इसके अलावा, योजना में पहले तालाब के किनारे पर पत्थर (पिचिंग) लगाने का कड़ा प्रावधान था, जिसे बाद में बिना किसी ठोस वजह के बदल दिया गया। इस बदलाव से भविष्य में मिट्टी फिर से कटकर तालाब में समा जाएगी और परियोजना का पूरा लाभ जनता को नहीं मिल पाएगा।
नियमों से बड़ा कौन—अधिकारी या संवेदक?
इस लापरवाही को लेकर स्थानीय लोगों ने कई बार संवेदक, संबंधित वार्ड पार्षद और नगर निगम के आला अधिकारियों को मौखिक रूप से शिकायतें दीं, लेकिन अब तक धरातल पर कोई सुधार नहीं देखा गया। ग्रामीणों का सीधा सवाल है कि जब सरकार हर स्तर पर पारदर्शिता और जवाबदेही की बड़ी-बड़ी बातें करती है, तो फिर करोड़ों रुपये की इस महत्वाकांक्षी योजना का विवरण सार्वजनिक करने वाला बोर्ड लगाने से क्यों बचा जा रहा है? आखिर आम जनता को योजना की वास्तविक लागत और तकनीकी विवरण जानने के अधिकार से क्यों वंचित किया जा रहा है? अब सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा हो रहा है कि विभागीय नियमों से बड़ा कौन है—अधिकारी या संवेदक? क्या विभाग इस गंभीर मामले को संज्ञान में लेते हुए जवाबदेही तय करेगा या फिर यह भ्रष्टाचार भी फाइलों में ही दबा रह जाएगा।
अभियंता ने जांच कर सख्त कार्रवाई का दिया आश्वासन
तालाब गहरीकरण कार्य में बड़े पैमाने पर अनियमितता और नियमों के उल्लंघन का मामला जैसे ही तूल पकड़ने लगा, विभागीय स्तर पर भी हलचल शुरू हो गई है। इस पूरे विषय पर नगर निगम के अभियंता रौशन कुमार ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए बताया कि उन्हें इस कार्य के संबंध में स्थानीय ग्रामीणों के माध्यम से गंभीर शिकायतें प्राप्त हुई हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच के लिए बहुत जल्द स्वयं कार्यस्थल पर पहुंचेंगे। अभियंता ने ग्रामीणों को भरोसा दिलाते हुए आश्वस्त किया कि यदि जांच के दौरान कार्यस्थल पर एस्टीमेट बोर्ड न होने या तकनीकी प्रावधानों में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी और लापरवाही पाई जाती है, तो संवेदक को निर्धारित प्रावधानों के अनुसार ही सही ढंग से कार्य करने के लिए बाध्य किया जाएगा और नियमों का उल्लंघन करने पर सख्त कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल, स्थानीय लोगों ने जिला प्रशासन और नगर निगम से अविलंब योजना संबंधी बोर्ड लगाने और कार्य की उच्च स्तरीय जांच कराने की मांग दोहराई है।





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