देश में आज भी ब्रिटिश काल की कई ऐसी कुप्रथाएं मौजूद हैं जिन्हें बहुत पहले खत्म कर दिया जाना चाहिए था, और 'टू-फिंगर टेस्ट' उन्हीं में से एक है। इस अमानवीय और अवैज्ञानिक चिकित्सीय जांच को लेकर झारखंड हाईकोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। मुख्य न्यायाधीश एम. एस. सोनाक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने रेप पीड़िताओं के संरक्षण और पुनर्वास से जुड़ी एक स्वतः संज्ञान जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया है कि सभी सरकारी और निजी अस्पतालों में इस विवादित टू-फिंगर जांच को पूरी तरह से प्रतिबंधित किया जाए। अदालत ने बेहद सख्त लहजे में कहा है कि यदि कोई भी डॉक्टर या पैरामेडिकल कर्मचारी भविष्य में इस तरह का परीक्षण करता हुआ पाया जाता है, तो उसके खिलाफ सख्त विभागीय कार्रवाई की जाएगी और इसे गंभीर पेशेवर कदाचार माना जाएगा।
इसके साथ ही, हाईकोर्ट ने न्यायिक प्रक्रिया में संवेदनशीलता पर जोर देते हुए कहा कि यौन हिंसा की शिकार महिलाओं को न्याय दिलाने के बजाय उन्हें सामाजिक उपहास और मानसिक प्रताड़ना का सामना न करना पड़े, इसके लिए पुलिस को सबसे पहले बिना किसी देरी के 'जीरो एफआईआर' दर्ज करनी होगी। पीड़िता की मेडिकल जांच और बयान दर्ज करने में किसी भी प्रकार की देरी को अदालत ने पूरी तरह से असहनीय माना है। इसके अलावा, अदालत ने सभी प्रकार के मीडिया—चाहे वह प्रिंट हो, इलेक्ट्रॉनिक हो या इंटरनेट मीडिया—को भी सख्त हिदायत दी है कि किसी भी माध्यम से दुष्कर्म पीड़िता के नाम या उसकी पहचान को प्रकाशित या प्रसारित न किया जाए। यह फैसला सुप्रीम कोर्ट की उन पूर्व गाइडलाइन्स के भी अनुरूप है, जिनमें साल 2013 और 2022 में इस टेस्ट को महिलाओं के मान-सम्मान और निजता के खिलाफ बताते हुए इसे मेडिकल सिलेबस से बाहर करने तक की बात कही गई थी। झारखंड हाईकोर्ट का यह कदम यह संदेश देता है कि न्याय की प्रक्रिया को स्वयं पीड़िता के लिए एक नई सजा नहीं बनने दिया जा सकता।

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