झारखंड की सियासत में भ्रष्टाचार के मुद्दों को लेकर एक बार फिर बड़ा भूचाल आ गया है, जहां भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेताओं ने राज्य की मौजूदा हेमंत सोरेन सरकार के खिलाफ तीखा मोर्चा खोल दिया है। सोशल मीडिया और प्रेस वार्ताओं के माध्यम से सामने आए इन गंभीर आरोपों को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, जिसमें राज्य की कानून व्यवस्था और नीतिगत फैसलों पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट साझा करते हुए हेमंत सरकार को सीधे कटघरे में खड़ा किया है। उन्होंने कड़े शब्दों में आरोप लगाया कि राज्य में हुआ कथित शराब घोटाला महज एक साधारण भ्रष्टाचार नहीं है, बल्कि यह सत्ता के सीधे संरक्षण में चलाया जा रहा एक सुनियोजित और संगठित आर्थिक अपराध है। मरांडी के अनुसार, छत्तीसगढ़ और झारखंड के अंतर्राज्यीय शराब माफियाओं ने सत्ता के गलियारों में बैठे करीबियों के साथ मिलीभगत करके जनता की गाढ़ी कमाई को खुलेआम लूटा है। उन्होंने केंद्रीय एजेंसी ईडी की कार्रवाई की सराहना करते हुए कहा कि भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो यानी एसीबी चाहे जितनी कोशिश कर ले, इस महाघोटाले की परतें अब धीरे-धीरे पूरे प्रदेश के सामने आ रही हैं और इसे दबाना अब नामुमकिन है।
नीतिगत बदलावों से राजस्व को लगा हजारों करोड़ का चूना
इस कथित शराब सिंडिकेट के वित्तीय खेल पर रोशनी डालते हुए बाबूलाल मरांडी ने दावा किया कि छत्तीसगढ़ के शराब कारोबारी अनवर ढेबर की एक हजार करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति प्रवर्तन निदेशालय द्वारा पहले ही जब्त की जा चुकी है, जो इसी शराब सिंडिकेट के जरिए अवैध रूप से अर्जित की गई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि अनवर ढेबर ने विनय चौबे के माध्यम से सत्ता के शीर्ष तक अपनी पहुंच बनाई और झारखंड में शराब घोटाले की पूरी पटकथा तैयार की। विपक्ष द्वारा बार-बार जताए गए विरोध और चेतावनियों के बावजूद, हेमंत सरकार ने कथित तौर पर शराब नीति में बदलाव कर शराब माफियाओं को सीधा फायदा पहुंचाया, जिससे राज्य के खजाने और आम जनता को हजारों करोड़ रुपये का भारी नुकसान उठाना पड़ा। मरांडी ने बेहद आक्रामक अंदाज में कहा कि यह घोटाला सिर्फ पैसों की लूट नहीं है बल्कि झारखंड के भविष्य के साथ बड़ा विश्वासघात है, जहां गरीबों के विकास, युवाओं के रोजगार और बुनियादी जरूरतों के पैसे को माफियाओं की जेबों में डाल दिया गया। उन्होंने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को चेतावनी देते हुए कहा कि वे चाहे जितनी भी राजनीतिक ढाल खड़ी कर लें, जनता की गाढ़ी कमाई लूटकर बच निकलना अब संभव नहीं होगा क्योंकि न्यायालय अंततः सभी दोषियों को उनके कृत्यों की कठोर सजा देकर रहेगा।
ट्रेजरी घोटाले के सच को भी दबाने का प्रयास
शराब घोटाले के साथ-साथ राज्य के वित्तीय तंत्र में सामने आई एक और बड़ी अनियमितता को लेकर सरकार की घेराबंदी तेज हो गई है। भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता प्रतुल शाहदेव ने रांची में आयोजित एक प्रेस वार्ता के दौरान हेमंत सरकार पर बहुचर्चित ट्रेजरी घोटाले की जांच को जानबूझकर दबाने का बेहद गंभीर आरोप मढ़ा है। शाहदेव का कहना है कि सरकार की वर्तमान कार्यशैली से जनता के बीच यह साफ संदेश जा रहा है कि वह घोटाले की निष्पक्ष जांच कराने के बजाय पूरे मामले पर पर्दा डालने की कोशिश कर रही है। उन्होंने राज्य सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल यानी एसआईटी की कछुआ चाल पर कड़े सवाल उठाए। उनका आरोप है कि जांच की धीमी गति के कारण ही इस पूरे प्रकरण की समयबद्धता और निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जिन ट्रेजरी अधिकारियों और ड्राइंग एंड डिस्बर्सिंग ऑफिसर्स के कार्यकाल में ये तमाम वित्तीय गड़बड़ियां सामने आईं, वे आज भी अपने महत्वपूर्ण पदों पर शान से बने हुए हैं, जिससे निष्पक्ष जांच की उम्मीद करना बेमानी साबित हो रहा है।
विशेष ऑडिट में देरी और केंद्रीय एजेंसी से जांच की मांग
प्रतुल शाहदेव ने आधिकारिक घटनाक्रम का हवाला देते हुए बताया कि राज्य सरकार ने सत्रह अप्रैल दो हजार छब्बीस को महालेखाकार से इस मामले का विशेष ऑडिट कराने की अनुशंसा तो की थी, लेकिन डेढ़ महीने से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी जांच से संबंधित आवश्यक कागजात और दस्तावेज ऑडिट टीम को उपलब्ध नहीं कराए गए हैं। उन्होंने दावा किया कि दस्तावेजों के इसी अभाव के कारण विशेष ऑडिट की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पा रही है, जो सरकार की मंशा पर गंभीर संदेह पैदा करता है। इसके अलावा, एसआईटी की कार्यप्रणाली भी निराशाजनक रही है क्योंकि पिछले दो महीनों के दौरान यह टीम केवल बोकारो जिले का ही दौरा कर पाई है, जबकि बोकारो के अलावा दुमका, हजारीबाग, रामगढ़ और देवघर जैसे कई अन्य महत्वपूर्ण जिलों में भी जांच की सिफारिश की गई थी। शाहदेव ने इस पूरे मामले की तुलना बिहार के ऐतिहासिक चारा घोटाले से करते हुए आगाह किया कि यदि यही स्थिति रही तो जांच पूरी होने में कई वर्ष लग जाएंगे। उन्होंने मांग की कि यदि राज्य सरकार इस मामले की निष्पक्ष और प्रभावी जांच कराने में सक्षम नहीं है, तो उसे तुरंत इस पूरे मामले को किसी केंद्रीय जांच एजेंसी को सौंप देना चाहिए ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके।

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