कांग्रेस पार्टी इस समय गंभीर आंतरिक प्रबंधन के भारी संकट से पूरी तरह जूझ रही है। हालिया राज्यसभा और विधान परिषद चुनाव के चौंकाने वाले नतीजों ने पार्टी की कमजोर रणनीति की सारी कमियां सबके सामने उजागर कर दी हैं। एक तरफ जहां कर्नाटक में उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार की जोड़ी ने जबरदस्त रणनीति बनाकर बड़ी सफलता हासिल की, वहीं अन्य राज्यों में पार्टी बुरी तरह बिखर गई। कर्नाटक में कांग्रेस के पास अपने केवल एक सौ पैंतीस विधायक थे, लेकिन सटीक गणित और शानदार प्रबंधन के चलते उन्हें कुल एक सौ इक्यावन वोट मिले जिससे पार्टी को शानदार जीत मिली।
कर्नाटक की शानदार जीत के विपरीत झारखंड में कांग्रेस को एक बेहद शर्मनाक और अप्रत्याशित हार का सामना करना पड़ा है। यहाँ कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा की जीत पूरी तरह तय मानी जा रही थी। केंद्रीय आलाकमान ने भूपेश बघेल तथा अजय शर्मा जैसे दिग्गज नेताओं को पर्यवेक्षक बनाकर रांची भेजा था लेकिन जमीन पर इसका कोई भी फायदा नहीं दिखा। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल चुनाव के सबसे खास मौके पर वहाँ मौजूद ही नहीं थे। केंद्रीय नेतृत्व की ढिलाई के चलते सहयोगी दल के विधायकों ने पाला बदलकर क्रॉस वोटिंग कर दी और पूरा खेल बुरी तरह बिगड़ गया।
मध्य प्रदेश की कहानी तो कांग्रेस पार्टी के लिए और भी अधिक निराशाजनक और हैरान करने वाली रही है। यहाँ राहुल गांधी की बेहद करीबी मानी जाने वाली वरिष्ठ नेता मीनाक्षी नटराजन का नामांकन पत्र स्क्रूटनी के दौरान ही खारिज हो गया था। उनके हलफनामे में कुछ तकनीकी त्रुटियां रह गई थीं जिसके कारण उसे सीधे रद्द कर दिया गया। तीन बार लोकसभा चुनाव लड़ चुकीं इतनी ज्यादा अनुभवी नेता से ऐसी बुनियादी गलती होने पर कांग्रेस आलाकमान बेहद असहज है। प्रांतीय नेताओं की आपसी गुटबाजी के कारण ही पार्टी को अपने मजबूत गढ़ों में करारी शिकस्त झेलनी पड़ी है।

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